चूमना चाहा तुम्हें, ज़ुल्म यह संगीन है

सुराही चूमना चाहा तुम्हें, ज़ुल्म यह संगीन हैचूमनेसे गर रहा, हुस्न की तौहीन हैनेकनामी का चलन क्यों सिखाया, वाइज़ों ?दागदारों की यहाँ ज़िंदगी रंगीन है लो, मुकम्मल हो गयी कत्ल़ की तैयारियाँहै भरोसा, प्यार है; साँप है, आस्तीन है अल्विदा, ऐ रहबरों; शुक्रिया, ऐ... [पूरी पोस्ट]
writer मिलिंद / Milind

गज़ल

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[19 Aug 2009 05:51 AM]

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