क्या बताऊँ किस तरह यह ज़िंदगी जाती रही
क्या बताऊँ किस तरह यह ज़िंदगी जाती रहीहर सुबह के बाद अक्सर शामेगम आती रहीखेलकर दिलसे हमारे दिल वह बहलाती रहीजब भरा दिल, तोडकर दिल, दोस्त कहलाती रही"धूप है तेरा मुकद्दर, प्यार शबनमसे न कर"गुल न माना बात, बगिया लाख़ समझाती रही’ यूँ किसीने लत लगाई दर्द...
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मिलिंद / Milind
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[31 Aug 2009 03:31 AM]



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