बढी बात जब बातही बातमें

सुराही बढी बात जब बातही बातमेंहसीं शाम ढलने लगी रातमेंन पर्दा उठाओ, कसम है तुम्हेमिले ना जुनूँ और जज़्बातमेंतमन्ना जवाँ क्यों न होने लगे ?झुकाये नज़र वह मुलाकातमेंकहीं फूल का बस बहाना न होकहीं दिल दिया हो न सौगातमेंसमझ लो है आतिश मुहब्बतजनीअगरचे लगे आग... [पूरी पोस्ट]
writer मिलिंद / Milind

गज़ल

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[23 Oct 2009 06:25 AM]

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