पँखडी को चूमकर शबनम हवामें खो गयी
पँखडी को चूमकर शबनम हवामें खो गयीलाजसे चटकी कली, खिलकर जवाँ फिर हो गयीगेसुओं की छाँवमें या हिज्रमें रातें कटीदूर दोनो सूरतोमें नींद तो कोसो गयीफिक्र गर होती हमारी, रुक न जाती वह ज़रा ?करवटें बदला किये हम, रात आयी सो गयीआपसे तो नर्मदिल हैं आसमाँकी...
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मिलिंद / Milind
गज़ल
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[14 Dec 2009 01:57 AM]



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