ज़िंदगी के ख्वाब से मैं डर रहा हूँ

सुराही ज़िंदगी के ख्वाब से मैं डर रहा हूँमौत के आनेसे पहले मर रहा हूँमौत से डरता रहा हूँ रात-दिन मैंइस तरह, ना जी रहा, ना मर रहा हूँकारवाँ चलता रहा है ज़िंदगी कामैं ज़रा पीछे मगर अक्सर रहा हूँ बंद दिल के द्वार जब से कर चुकी वहमैं तभी से आज तक बेघर रहा हूँवह गयी तो... [पूरी पोस्ट]
writer मिलिंद / Milind

गज़ल

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[27 Dec 2009 02:39 AM]

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