यात्रा
मिट चुका हैं गाँव निकला था जिसे मैं छोडकरऔर बसना था जहाँ, आबाद वह ना हो सकादूर तक आगे दिखाई दे रही है बस डगररोकभी सकता नहीं मुडती हुई अपनी नज़रलौटभी सकता नहीं अपनी प्रतिज्ञा...
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मिलिंद / Milind
कविता
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[19 Jan 2010 05:53 AM]



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