फूल बरसों तक चढाएँ पत्थरोंपर

सुराही फूल बरसों तक चढाएँ पत्थरोंपरनाम तब आया हमारा उन लबोंपरप्यास दिल कि कब बुझी है आँसुओंसे ?कम नहीं था वरना पानी आरिज़ोंपरयह दुवा है उम्रभर वह मुस्कुराएजान भी कुरबान ऐसी हसरतोंपरक्या चलन बदला हुआ है मौसमोंका ?क्यों ख़िज़ाँ छाने लगी है कोंपलोंपर ?आँधियोंने फिर... [पूरी पोस्ट]
writer मिलिंद / Milind

गज़ल

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[22 Feb 2010 02:05 AM]

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