क्योंकि मैं घबड़ा जाती हूँ तेरी नाराजगी से
दीदी समता की एक रचना- बगैर आँसू के जो गुलशन हरा न हो, भला क्या वास्ता हो उस हरियाली से । वो आईना धुँधला ही पर जाये तो बेहतर हो जो खौफ़ का समां बना अपनी सफ़ेदगी से । बहुत चाहा, बहुत समझा अपना जिसे, कैसे नवाज दूँ उसे शब्द अजनबी से ।...
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चंदन कुमार झा
मुहब्ब्त
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[15 Mar 2010 13:31 PM]



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