जाने क्यूँ आज ये प्यार छोटा पड़ रहा है

मौन के खाली घर मे-                                       ओम आर्य कितनी देर और भला कितनी देर और लिखी जा सकती है इस तरह इक तरफ़ा प्रेम या विरह की कवितायें हालांकि यह किसी शक या शिकवा करने जैसा है और इसलिए मैं अभी तक बचता रहा हूँ यह कहने से कि मुझे नहीं मालुम तुम्हारी रातों में दरारें पड़ती हैं या नहीं और अगर हाँ तो क्या... [पूरी पोस्ट]
writer ओम आर्य
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[15 Mar 2010 13:25 PM]

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