हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था .....

वेबलाग पर... परवीन शाकिर...गर आज़ाद नज़्म को बेबाकी से कहना भी एक हुनर है ... तो यकीन मानिये इस हुनर में इनका जवाब नहीं.....हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था तेरे शानो पे कोई चाहत नहीं थी मेरे जिम्मे कोई आँगन नहीं था कोई वादा तेरी ज़ंजीर -ए -पा बनने नहीं पाया किसी... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ .अनुराग
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[15 Mar 2010 12:09 PM]

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