सिर्फ एक कौवा
अरविंद चतुर्वेदसिर्फ एक कौवाक्रां-क्रां करताकबसे मुंडेर पर बैठाबड़े गुस्से में चोंच से खुरच रहा है धूपबुद्धू कहीं के!छाया में बैठी जीभ चाटती बिल्लीहैरान है- धूप क्या कोई चमकौवा कागज की पन्नीया चांदी की पत्तर हैजो खुरचने से छूट जाएगी?खुद में परेशान...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[15 Mar 2010 12:02 PM]



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