कैसे गाऊं प्रेम के गीत

Kuchh kahi kuchh unkahi कैसे गाऊं मैं प्रेम के गीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत ।अवरुद्ध हो वाणी मेरी सीने के भीतर घुट रही है,दुनिया मेरी मेरे ही हाथों देखो कैसे लुट रही है,हार में तब्दील हो गयी जीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत।कल तलक जो संग रहने की कसम थे खा रहे,आज मुझसे रूठ कर वो तो... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
views
12
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
2
[15 Mar 2010 11:47 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix