कैसे गाऊं प्रेम के गीत
कैसे गाऊं मैं प्रेम के गीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत ।अवरुद्ध हो वाणी मेरी सीने के भीतर घुट रही है,दुनिया मेरी मेरे ही हाथों देखो कैसे लुट रही है,हार में तब्दील हो गयी जीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत।कल तलक जो संग रहने की कसम थे खा रहे,आज मुझसे रूठ कर वो तो...
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Nihar Khan
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[15 Mar 2010 11:47 AM]



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