यह कैसा हक?

बातों-बातों में... रविवार का दिन था। घर से निकली थी एक दोस्त के यहां जाने के लिए। काफी दिनों से सोच रही थी। आज का ही दिन मिल पाया। सुबह जल्दी-जल्दी करने के बाद भी देर हो ही गई। खर, जल्दी-जल्द बस स्टॉप पहुंची। इंतजार कर रही थी बस का। करीब 15-20 मिनट के इंतजार के बाद वह बस... [पूरी पोस्ट]
writer श्वेता यादव
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[02 Oct 2009 06:32 AM]

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