ऐसी खुशफहमी भी ठीक नहीं है, जोशी जी...!
जनसत्ता (6 दिसंबर, 2009) में प्रकाशित मेरे लेख ‘कला-आलोचना की भाषा’ (http://matmatantar.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html) पर दो बिल्कुल ही भिन्न तरह की प्रतिक्रिया दो भिन्न रूपों में आईं। पहली अलिखित, लेकिन दूसरी लिखित।मैं अपना छपा लेख देख-पढ़ भी न...
[पूरी पोस्ट]
राजू रंजन
भाषा
15
0
0
0
0
[15 Mar 2010 10:05 AM]



Shuffle








