जली बरेली, हमको क्या?
नकली जीवन जी कर असली गीत लिखें ये मुश्किल है, लेकिन असली जीवन भी क्या अब जीने के काबिल है, प्रश्न बड़ा है, अड़ा पड़ा है, और खड़ा है रस्ते पर, टंका हुआ है चाँद सितारा, क्यों मुजरिम के बस्ते पर, भूख, गरीबी, मज़हब, बीबी, बदला खून खराबे का, इन सब में ही छिपा...
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अभिनव
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[15 Mar 2010 02:38 AM]



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