घर को घर क्या कहें
ईंट पत्थर का है घर को घर क्या कहें इक अकेले सफ़र को सफ़र क्या कहें कोई आहट नहीं कोई थपकी नहीं बिन प्रतीक्षा रहे दर को दर क्या कहें जो तरसता रहा ...
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chandrabhan bhardwaj
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[15 Mar 2010 02:46 AM]



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