मेरे महबूब तुम मेरे बिन नहीं रह पाओगे

Kuchh kahi kuchh unkahi (एक इरादा किया अपने पुराने दिनों को पुनर्भ्रमण करने का.बहुत सारी कवितायेँ हैं जो उन् दिनों की हैं जहाँ व्यक्तित्व में ठहराव नहीं था। अपनी संवेदनशीलता को लिख कर मैं खुद को उबारता था अपने एकाकीपन से। ये कविता १९८५ से १९९० के बीच लिखी गयी हैं। डायरी के... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[14 Mar 2010 12:12 PM]

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