दिनों बाद .........
चलूं आज दिनॊं बाद लिखूं कुछ ! कॊई कविता ! हेरूं मन को पुरूं गेहूं के टूण –सी छोटी गैरजरूरी बातों के टूटॆ धागे ! शब्दों को धोऊं, पॊछूं बांधू उनकॊ धागे में भावॊं के जुलहे की पूंछ में टांकू उसे छोड़ू उसे भागे वह द्वारे द्वारे फूले फूले नदी किनारे तीरे तीरे...
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Aarjav
कविता
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[14 Mar 2010 11:03 AM]



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