दीवानगी
दीवानगीढूंढा करती थी जिन्हें बाग़ औ दरिया में कभी,जाने क्यों आज वो सारे वीराने मिले.जम गए थे जो लफ्ज़ कभी सीने में मेरे, उनको बहाने के आज सौ बहाने मिले. इस कदर रुसवा हुआ तू मुझसे,बस मयखाने में ही तेरे ठिकाने मिले.पलट के देखा तो झुके हुए...
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[14 Mar 2010 08:27 AM]



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