योगस्थ कुरू कर्माणि

कसौंधन दर्पण योगस्थ कुरू कर्माणिअर्थात् योग (समत्व) में स्थित होकर कार्य करो ।सफल परारथ है जग माहिं, कर्महीन नर पावत नाहीं ।।रामायण की अपरोक्त पंक्तियॉं हमें बताती है कि वह सब कुछ जिसकी हम इच्छा रखतें है, वह इस स्ष्टि में विधमान है पर उसके लिए हमें सही दिशा में कार्य... [पूरी पोस्ट]
writer बृजेन्‍द्र कुमार गुप्‍ता
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[03 Mar 2010 07:14 AM]

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