नींद - एक और कविता पुरानी डायरी से
जैसा कि मैं स्वीकारोक्ति कर चुका हूं कि मुझे पद्य की समझ नहीं है इसके बावजूद मैंने कुछेक धृष्टताएं इस क्षेत्र में की हैं।ऐसी ही एक कविता... पता नहीं कैसी है...प्यारी नींदआज फिर तैयार हो निकला मैंइस संग्राम मेंनई भोर में नया जीवन लिएभिड़ने को तैयार...
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सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi
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[14 Mar 2010 04:40 AM]



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