भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 3

एक आलसी का चिठ्ठा पहला भाग दूसरा भाग ... सरेह में दूर दिखते हैं - पोखरे के किनारे । नंगे हैं। वह घनापन गायब है जो कभी सिहरा देता था - पोखरा पर के बाबा अब नहीं रहे । गाजर घास को देखते हुए दीठ ठहर जाती है - कोलतार की सड़क पर दूब की पंक्ति उग आई है लम्बी - दूर तक । दूब - बचपन... [पूरी पोस्ट]
writer गिरिजेश राव
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[13 Mar 2010 23:08 PM]

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