दोस्त बनकर गले लगाता है वही ......पीठ पर खंजर भी लगाता है वही
दोस्त बनकर गले लगाता है वहीपीठ पर खंजर भी लगाता है वहीवफ़ा की रोज नयी कसमे उठाता है करवट बदलते ही बदल जाता है वही .... बंद पलकों में सजे है ख्वाब जिसके लिएचुपके से ख्वाब चुराता भी है वही .....तोड़कर अनकहे बेनामी रिश्तों की गिरहमेरी मायूसी पर मुस्कुराता भी...
[पूरी पोस्ट]
वाणी गीत
कविता
52
3
0
3
18
[13 Mar 2010 20:18 PM]



Shuffle








