खंजर....समुन्दर....आग

साहित्य योग दिल में उतर कर कहते हो दर्द तो नहीं है,खंजर मार कर कहते हो जख्म तो नहीं है,सिकायत करूँ भी तो किससे करूँ जज, मुजरिम और महबूब भी तुम्ही निकले सांसों को चुराकर कहते हो भस्म तो नहीं है, समुन्दर को छेड़ कर कहते हो लहर तो नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer Tej Pratap Singh
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[13 Mar 2010 12:50 PM]

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