जब दर्द पल रहा सीने में
जब दर्द पल रहा सीने में,तब मज़ा आ रहा जीने में ।खून पानी में तब्दील हुआ ,बदन गला और बहा पसीने में।दिल टुकड़े हो कर बिखर गया,हम जुट गए उसको सीने में।जब दर्द का दरिया उफन गया ,तब छेद हो गया है सफीने में।आंसू को जब से मय है समझा,मज़ा आ रहा है उसे पीने में।...
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Nihar Khan
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[13 Mar 2010 12:22 PM]



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