चितकबरी ग़ज़ल 'यक़ीन' की

अनवरत पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की क़लम से यूँ तो हर तरह की ग़ज़लें निकली हैं। पर कुछ का मिजाज़ बिलकुल बाज़ारू है। लेकिन बाजारू होते हुए भी अपने फ़न से उस में वे समाज की हक़ीकत को बहुत खूब तरीके से कह डालते हैं। जरा इस ग़ज़ल के देखिए ...... चितकबरी ग़ज़ल 'यक़ीन'... [पूरी पोस्ट]
writer दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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[13 Mar 2010 12:12 PM]

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