‘‘जंगल और जीव’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
रहता वन में और हमारे, संग-साथ भी रहता है। यह गजराज तस्करों के, जालिम-जुल्मों को सहता है।।समझदार है, सीधा भी है, काम हमारे आता है।सरकस के कोड़े खाकर, नूतन करतब दिखलाता है।।मूक प्राणियों पर हमको तो, तरस बहुत ही आता है। इनकी देख दुर्दशा अपना, सीना...
[पूरी पोस्ट]
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
13
1
0
1
2
[13 Mar 2010 11:25 AM]



Shuffle







