दहर को इक हसीं गुलज़ार बना रक्खा है
कभी कहीं कुछ लिखा था ......... कहाँ लिखा था याद नहीं ........ वो काग़ज़ का टुकड़ा कहाँ गया पता नहीं .... दो बंद याद हैं .... उसे यहाँ क़ैद कर लूँ इस से पहले कि दिमाग़ से भी निकल जाए जो कुछ अब तक याद है ....इक अदद ख्वाब, एक आरज़ू का हासिल है जो मुझे...
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अमिताभ मीत
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[13 Mar 2010 09:51 AM]



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