पुष्प गुच्छ भी दे न सकी मैं
" पुष्प गुच्छ भी दे न सकी मैं "पुष्प गुच्छ भी दे न सकी मैं ,अब कैसे मैं अश्रु छुपाऊं ।तुम हो गए नक्षत्र गगन के ,सखी धरणी की न बन पाऊँ ।रस्म सदा से जो चली आई ,ग्रहण सहज कैसे कर पाऊँ ।अंतरमन में प्रश्न उलझ गए ,अब उनको कैसे सुलझाऊँ ?इस अन्जान सफ़र पर एक दिन...
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Kusum Thakur
कविता
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[13 Mar 2010 08:14 AM]



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