हाय दइया करीं का उपाय...
चारु और मैंइधर संवाद-स्वाद, फिर अवसाद के कुछ क्षणों से गुजरते हुए चारुहासिनी की मनुहार से बाबूजी के लिखे कई गीत यूँ ही गुनगुनाता रहा । अपनी सहेलियों को बाबूजी के लिखे गीतों को गा-गाकर सुनाना और फिर अपनी इस समृद्धि पर इतराना उसकी बाल सुलभ क्रिया हो गयी है...
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हिमांशु । Himanshu
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[13 Mar 2010 05:20 AM]



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