पत्थर पर भी नहीं.
किसी अन्धियरिया रात का सपना होगापसीने से नहाए अकबकाये से मुंह पर खिंचती जायेगी आश्वासन की रेखा कि;कंधे पर रखा हिमालय उतरेगा कभी कटोरी भर आटा चेहरे पर पोत करदिखाएँगे, लाजवायेंगे सब को कि;देखो खली पेट अब भर गया हैभूख का अजगर पाँव के रास्ते उतर गया हैकिसी...
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बालकिशन
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[13 Mar 2010 03:27 AM]



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