आखिर मेरा घर कौनसा है-शोभना

Shobhna धीरे धीरे सूरज डूब रहा है, अँधेरे को गले लगाने के लिए न जाने क्यों इतना बेताब है ये.......परिंदे भी घरों की तरफ उड़े चले जा रहे है.......घर हाँ अपने अपने घर......समन्दर के किनारे बैठे बैठे मुझे लग रहा है जैसे मेरा अस्तित्व भी डूबता चला जा रहा है....अपनी... [पूरी पोस्ट]
writer Shobhna Choudhary
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[13 Mar 2010 01:13 AM]

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