दादाजी का व्यवहार और मेरा भय
‘हाँ भई! हाँ, मुझे तो इस घर में होना ही नहीं चाहिए।’ अड़सठ वर्षीय दादाजी क्षुब्ध, कुपित और आक्रोशित होकर अपने, दस वर्षीय पोते पर कटाक्ष कर रहे थे-घर के बाहर, ऐन सड़क पर आकर। इतनी जोर से कि आसपासवाले और आने-जानेवाले, न चाहकर भी सुन लें। ऐसा ही हुआ भी। सुनकर...
[पूरी पोस्ट]
विष्णु बैरागी
जीवन की पाठशाला
31
5
0
5
5
[12 Mar 2010 19:30 PM]



Shuffle








