कण-कण में भगवान है

उधेड़-बुन आँखें इतनी कमज़ोर हैं किसपने दिखाई नहीं देते हैंआदमी तो आदमीगधे दिखाई नहीं देते हैंकण-कण में भगवान हैये कुत्ते कब समझेगेकि बिन बादल-बरसात केकुकुरमुत्ते दिखाई नहीं देते हैंकैसे हैं ये महानगरकैसा इनका विकास हैकि बढ़ रही है आबादीऔर बच्चे दिखाई नहीं देते... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[12 Mar 2010 17:35 PM]

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