कभी कमी कोई आयी न इन ख़ज़ानों में
कभी कमी कोई आयी न इन ख़ज़ानों में।के दौलतें हैं बहोत इश्क़ के फ़सानों में ॥मैं ख़िरमनों की तबाही का ज़िक्र क्या करता,ये बात ग़र्म बहोत थी कल आसमानों में॥हवाएं करतीं मदद किस तरह सफ़ीनों की, जगह जगह पे थे सूराख़ बादबानों में॥हरेक की क़ीमतें चस्पाँ हैं उसके...
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[12 Mar 2010 11:54 AM]



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