यह जीवन है एक भार प्रिये एवं अन्य कवितायेँ

Kuchh kahi kuchh unkahi यह जीवन है एक भार प्रिये। थी तृषा जगी मन में मेरे,औ' प्यास कहाँ बुझ पाती है,जल की चाहत में भटक रहा,मन पाता है अंगार प्रिये।यह जीवन है एक भार प्रिये।जो दूर कहकशां सा दिखा, तो मन मयूर सा नाच उठा,पर पास जो जाकर देखा तो,पाया मरू का सा सार प्रिये।यह जीवन है... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[12 Mar 2010 11:32 AM]

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