बात

रजनीगन्धा बातें, बातों और बातों के पीछेखूबसूरत मंज़र भटकते हैंखामोश से,बंद किवाड़ के पीछेठाकुर जी से रहते हैं,हर दिन नए जंगल बनते हैं,दरदरे जंगल में चीड़ के पेड़धूप छाँव का खेल खेलते हैंरेशम के तार जब सिरा ढूँढते हैंमेरे से उलझ जाते हैंशाख पर तब बहुत सेज्योति पुंज नज़र... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[12 Mar 2010 09:05 AM]

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