मुक्तक 9
वो इक धान की पौध थी नन्ही मुन्नीजिसे बेटी कहकर पुकारा था मैंनेउसे और ही खेत में रोप आईजिसे अंकुरित कर दुलारा था मैंनेविदाई भी राहत-सी लगने लगी हैसमय की ज़रूरत-सी लगने लगी हैयुवा होते-होते यह बाँहों की बच्चीकिसी की अमानत-सी लगने लगी हैख़ज़ाने खनकते हुए...
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डा.मीना अग्रवाल
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[22 Oct 2008 13:06 PM]



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