एक सर्द ख़ामोशी....अंतहीन...
चारों तरफ एक बेचैन सी ख़ामोशी पसरी हुई है...! मुझे डर लगने लगा है इस सन्नाटे से! बार बार पसीना पोंछता हूँ! कोई दूर ले जाओ इस ख़ामोशी को....जो कानों के अन्दर से घुसकर मेरे पूरे शरीर में रेंगने लगी है! मेरे कान तरस गए हैं शोर को! इस सन्नाटे में मुझे मेरा...
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pallavi trivedi
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[12 Mar 2010 01:55 AM]



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