मुक्तक 36
ये खेत हमने दिए, क्यारियाँ हमीं ने दींज़मीं की गोद को फुलवारियाँ हमीं ने दींउदास-उदास-सी चुप से भरा हुआ था घरतुम्हारे सुनने को किलकारियाँ हमीं ने दीं !विरह का तीर तुम्हारी कमान छोड़ गई बिलखती-चीख़ती विरहन की जान छोड़ गईज़रा-सा ध्यान जो भटका तो मौलकर...
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डा.मीना अग्रवाल
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[12 Mar 2010 06:05 AM]



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