यही होता है, तो आखि़र यही होता क्‍यों है ...

उनींदरा मुझे लगा था,  वो जा चुकी है...हमेशा के लिए। इतने दिनों के मौन ने काफी तसल्‍ली दी थी, और मैंने इस बीच कई कवियों को पूरा पढ़ डाला। इस बात को तक़रीबन भूलते हुए कि मैं अब भी उससे उतना ही प्रेम करता हूं, पहले दिन जितना। लेकिन इसके बावजूद मैं कह सकता था... [पूरी पोस्ट]
writer शायदा
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[11 Mar 2010 12:19 PM]

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