ये कैसे गुरुजी
प्यार और दुलार से पत्थर दिल भी समझ जाते हैं, पर इन गुरुजी को कौन समझाए। इन्होंने आव देखा न ताउ और हो गए शुरू। ये पता नहीं किस का तैश अपने शिष्य पर उतार रहे हैं। कबीर जी ने कहा हैगुरु कुम्हार शिश कुम्भ है गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट ।अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहे...
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सचिन मिश्रा
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[11 Mar 2010 16:56 PM]



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