नवगीत: ऊषा को लिए बाँह में ---संजीव 'सलिल'
नव गीत:ऊषा को लिए बाँह मेंसंजीव 'सलिल'*ऊषा को लिए बाँह में,संध्या को चाह में.सूरज सुलग रहा है-रजनी के दाह में...*पानी के बुलबुलों सीआशाएँ पल रहीं.इच्छाएँ हौसलों कोदिन-रात छल रहीं.पग थक रहे, मंजिलकहीं पाई न राह में.सूरज सुलग रहा है-रजनी के दाह...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
samyik hindi kavita
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[11 Mar 2010 12:59 PM]



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