एकालाप ,,,,,,,,,,,,,
आज बस लिखना है .. संतोष के खातिर .. कभी कभी अपने को लिखना है , चिटके सपने को लिखना है .. आज पहली बार इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ कि ब्लॉग अपना घर होता है .. बाहर से थके हारे आते हैं और बाहरी वस्त्र उतार कर तौलिया...
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अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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[11 Mar 2010 13:05 PM]



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