पूरे चाँद की इस ख़ामोश रात
पूरे चाँद की इस ख़ामोश रातदिवंगत हुए फागुनऔर चैत के झुटपुटे मेंकिसी उनींदे सायबान सेझिर-झिर कर,पहाड़ की तलहटी में ये किसके जी का ख़ालीपनये किसके जी का उजासनदी की छप-छप के उस पार रिस रिस उसके स्वरों में गुंथा जा रहा है .ये कौन ख़ल्वतों में आधी रातबैंगनी...
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पारूल
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[11 Mar 2010 10:41 AM]



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