अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-4(विनोद कुमार पांडेय)

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने वृक्षों के मन-भाव को,कौन करे महसूस,नेता,पुलिस,बिचौलिए,बाँट रहें सब घूस.सबसे रो कर कह रहें,पीपल,बरगद,नीम,सिर्फ़ प्रदर्शन ही बना,हरियाली का थीम.वृक्ष लगाओ,धरा बचाओ,गावत फिरे समाज,पर करनी ना कछु दिखे,कहत न आवे लाज.हरियाली हरि सी भई,दुर्लभ हुई दरश,शाख मचलना... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[11 Mar 2010 10:20 AM]

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