बंदूक की नई फ़सल
टीवी पत्रकार अमृत उपाध्याय की ये कविता उनके ब्लॉग - कशमकश- से साभार ली गई हैः संजीवघर के पिछुआड़े,बोई थी कुछ बन्दूकेंकुछ दाने और कारतूस,इस बार घर गया तो खोजा, बन्दूक की फसल बर्बाद हो गई शायद,पता नहीं क्यों,नहीं ऊगे बंदूकऔर ना दाने कारतूस बन पाएक्यों न...
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संजीव
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[11 Mar 2010 09:44 AM]



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