रास्ते
रास्ते अपने आप में मुकाम होते हैं। पीले पड़ते पन्नों में,कुछ जानी पहचानी नज़्म की आधी अधूरी याद में, बहुत चाव से बैठे बतियाये बरामदे के कोने में.....थोड़ी थोड़ी सी पहचान छूट जाती है। अपने हिस्से की पहचान ना जाने कब कहाँ कहाँ गिरकर पनप जाती है। बहुत दूर...
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Beji
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[11 Mar 2010 09:30 AM]



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