बहुत बदबख्त बशर तेरा दौरे-जमाँ निकला....

जो छिपाए ना बने.... बाद रहज़नी के कुछ यूं सफ़र का समा निकलाफ़िर लूटा के शुकुं जिस्त का कारवां निकला ॥सिवा कत्ल के कोई न थी रज़ा तेरी मगरदर्द से ज्यादा हर दर्द का सामां निकला ॥बिक गया निशात-ए-जि़गर यूं सरे शहरकुछ इस कदर इस बेकद्र का कद्रदां निकला ॥लिखते थे दर्द कि वज़ा न हो... [पूरी पोस्ट]
writer Dr.Rakesh
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[10 Mar 2010 04:22 AM]

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