कुछ शेर (मिर्ज़ा ग़ालिब)

मिर्ज़ा ग़ालिब रुख़े-निगार से, है सोज़े-ज़ाविदानिए-शमअ,हुई है आतशे-गुल आबे-ज़िन्दगानिऐ-शमअ ।"अर्थात् प्रियतमा के मुख (के सौंदर्य ) से ही शमअ को यह जलन की अमरता प्राप्त हुई है(उनके मुख को देखकर शमअ ईर्ष्या से जल रही है ) । उस फूल की आग शमअ के लिये अमृत बनी हुई है ।"*... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

mirza ghalib

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[11 Mar 2010 08:15 AM]

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